भारत के लोकतंत्र को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्रों में गिना जाता है। लेकिन आजादी से लेकर आज तक धीरे-धीरे यह लोकतंत्र से अपराधी-तंत्र में परिवर्तित होता जा रहा है। आज अकर्मण्य, बेईमान तथा भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों की प्रत्येक पार्टी में भरमार है। कोई भी पार्टी या दल ऐसा नही है जिसमें अपराधिक प्रवृति के लोग न हों। चौदहवीं लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो चुका है तथा पंद्रहवीं लोकसभा के लिए घमासान शुरू हो चुका है।पिछली लोकसभा का लेखा-जोखा देखें तो झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के 5 सांसदों में से 5 (100%), बसपा के 19 सांसदों में से 8 (42%), जद(यु) के 8 सांसदों में से 3 (38%), भाजपा के 138 सांसदों में से 29 (21%), कांग्रेस के 145 सांसदों में से 26 (18%) तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के 43 सांसदों में से 7 (16%) सांसद दागी थे। नेशनल वाच द्वारा वर्ष 2004 के आम चुनाव को आधार बनाकर किये गए इस सर्वक्षण के अनुसार कुल निर्वाचित 539 सांसदों में से 125 यानि 23% सांसद दागी थे। पंद्रहवीं लोकसभा में किसी भी एक पार्टी को बहुमत मिलेगा, इसमें संदेह है। गठजोड़ की सरकार में जिसके पास ज्यादा सांसद होंगे वही किंगमेकर होगा। अतः इस बार भी अपराधिक प्रवृति ले लोग खुलकर मैदान में होंगे।
इस सब के लिए जनता-जनार्दन ही जिम्मेदार है, क्योंकि ऐसे दागियों को जनता ही चुनकर संसद में भेजती है। इसके लिए जनता भी अपने जिम्मेदारी से नही बच सकती है। ऐसा नही है कि जनता के पास इसका कोई विकल्प नही है। राजनीति में अयोग्य लोगों को आने से रोकने के लिए निर्वाचन आयोग की नियमावली के नियम '49 ओ' में मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को नकारने का विकल्प दिया गया है। अगर मतदाता किसी भी प्रत्याशी को चुनाव की कसौटी पर खरा नही पता है तो वोटर रजिस्टर में फार्म '17 अ' भरकर सभी प्रत्याशियों को नकार सकता है। किंतु मतदाताओं में जागरूकता की कमी और निर्वाचन आयोग की नियमावली के नियम '49 ओ' का पर्याप्त प्रचार-प्रसार न हो पाने के कारण इसका ज्ञान अधिकांश मतदाताओं को नही है और इसका प्रयोग न के बराबर हो रहा है। पिछले कुछ समय से जन-प्रतिनिधियों की सदस्यता ख़त्म करने का अधिकार ' राइट टु रिकाल' भी चर्चा में रहा है। पिछले नवम्बर में दिल्ली में एक गोलमेज सम्मलेन में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी सुझाव दिया था कि जनता के पास 'राइट टु रिकाल' होना चाहिए। 'राइट टु रिकाल' नई अवधारणा नही है। नगर सभ्यता के विकास से लेकर अब तक कई देशों में यह व्यवस्था है। इसके तहत अमेरिका में अब तक लगभग नौ मामलों में मेयरों और गवर्नरों को उनके पदों से हटाया जा चुका है। कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और वेनेजुएला में भी यह व्यवस्था है। भ्रष्ट और बेईमान प्रतिनिधियों की सदस्यता को समाप्त करने का यह एक सशक्त नियम है, किंतु इसके दुरूपयोग से भी इंकार नही किया जा सकता है। जो वोटर तमाम बातों को जानते हुए भी दागी व्यक्तियों को चुन सकता है, वह उसे हटाने की प्रक्रिया में जागरूकता से हिस्सा लेगा, इसमें संदेह है।
केवल नियमों या व्यवस्थाओं को बना देना ही पर्याप्त नही होता है बल्कि उनके प्रति जागरूकता पैदा करना और उनका प्रचार-प्रसार कर उनकी सही जानकारी लोगों तक पहुचाने से ही उनकी प्रासंगिकता सिद्ध होती है। इस पूरी चुनाव प्रक्रिया का असर अंततः जनता पर ही पड़ता है। अतः मतदाताओं को भी अपने विवेक के साथ सही प्रत्याशी का ही चुनाव करना होगा , ताकि वह जनता के साथ वह न्याय कर सके।
इस सब के लिए जनता-जनार्दन ही जिम्मेदार है, क्योंकि ऐसे दागियों को जनता ही चुनकर संसद में भेजती है। इसके लिए जनता भी अपने जिम्मेदारी से नही बच सकती है। ऐसा नही है कि जनता के पास इसका कोई विकल्प नही है। राजनीति में अयोग्य लोगों को आने से रोकने के लिए निर्वाचन आयोग की नियमावली के नियम '49 ओ' में मतदाताओं को सभी प्रत्याशियों को नकारने का विकल्प दिया गया है। अगर मतदाता किसी भी प्रत्याशी को चुनाव की कसौटी पर खरा नही पता है तो वोटर रजिस्टर में फार्म '17 अ' भरकर सभी प्रत्याशियों को नकार सकता है। किंतु मतदाताओं में जागरूकता की कमी और निर्वाचन आयोग की नियमावली के नियम '49 ओ' का पर्याप्त प्रचार-प्रसार न हो पाने के कारण इसका ज्ञान अधिकांश मतदाताओं को नही है और इसका प्रयोग न के बराबर हो रहा है। पिछले कुछ समय से जन-प्रतिनिधियों की सदस्यता ख़त्म करने का अधिकार ' राइट टु रिकाल' भी चर्चा में रहा है। पिछले नवम्बर में दिल्ली में एक गोलमेज सम्मलेन में लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी सुझाव दिया था कि जनता के पास 'राइट टु रिकाल' होना चाहिए। 'राइट टु रिकाल' नई अवधारणा नही है। नगर सभ्यता के विकास से लेकर अब तक कई देशों में यह व्यवस्था है। इसके तहत अमेरिका में अब तक लगभग नौ मामलों में मेयरों और गवर्नरों को उनके पदों से हटाया जा चुका है। कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और वेनेजुएला में भी यह व्यवस्था है। भ्रष्ट और बेईमान प्रतिनिधियों की सदस्यता को समाप्त करने का यह एक सशक्त नियम है, किंतु इसके दुरूपयोग से भी इंकार नही किया जा सकता है। जो वोटर तमाम बातों को जानते हुए भी दागी व्यक्तियों को चुन सकता है, वह उसे हटाने की प्रक्रिया में जागरूकता से हिस्सा लेगा, इसमें संदेह है।
केवल नियमों या व्यवस्थाओं को बना देना ही पर्याप्त नही होता है बल्कि उनके प्रति जागरूकता पैदा करना और उनका प्रचार-प्रसार कर उनकी सही जानकारी लोगों तक पहुचाने से ही उनकी प्रासंगिकता सिद्ध होती है। इस पूरी चुनाव प्रक्रिया का असर अंततः जनता पर ही पड़ता है। अतः मतदाताओं को भी अपने विवेक के साथ सही प्रत्याशी का ही चुनाव करना होगा , ताकि वह जनता के साथ वह न्याय कर सके।